Manqabat




मन्क़बत सरकार गौस ए आज़म 


१२२२ १२२२ १२२२ १२२२ 
लबों पे है मेरे हरदम तराना गौस ए आज़म का 
दीवाना हूँ दीवाना हूँ दीवाना गौस ए आज़म का 

करिश्मा ऐसा हे जिसको न भूलेगी कभी दुनिया 
फ़क़त ठोकर से मुर्दों को जिलाना गौस ए आज़म का  

अगर जलता है तो जलता रहे नज्दी ज़माने में 
न छोड़ेंगे कभी नारा लगाना गौस ए आज़म का 

ये चोखट क़ातिबे तक़दीर दुनिया में बनी मेरी 
न छोडूंगा कभी भी आस्ताना गौस ए आज़म का 

अजब है मामला उनका अजब है कैफ़ियत उनकी 
ज़मीनों अर्श हैं दोनों ठिकाना गौस ए आज़म का 

ब फज्ले रब वो भरते हैं सभी की झोलियाँ हसरत 
सवाली है तभी तो ये ज़माना गौस ए आज़म का 


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मन्क़बत सरकार आला हज़रत 

  कुछ ऐसा फैज़ मिलता हे रज़ा के आस्ताने से 
  अकीदा ठोस होता हे बरेली आने जाने से 

 रज़ा का नाम चमका हे मदीने की तजल्ली से 
 मिटा हे न मिटेगा ये किसी के भी मिटाने से

 मैं रज़वी हूँ मुझे दुनिया रज़ा का शेर कहती हे
 ए नज्दी तू न टकराना रज़ा के इस दीवाने से 

 ये वो अहमद रज़ा हे जिसने निस्बत को ज़िया बख्शी 
  लिपट कर खूब रोया हे नबी के आस्ताने से 

ज़माना  इस लिए अहमद रज़ा को याद करता हे 
बला की उनको निस्बत थी मोहम्मद के घराने से 

मुजद्दिद तो बहुत गुज़रे ज़माने से मगर हसरत 
मेरे अहमद रज़ा जैसा नहीं गुज़रा ज़माने से 
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