ग़ज़ल
2212 2212 221
तारीख़ ने जिस शख्स को ग़द्दार कहा है
हाकिम ने उसे आज वफादार कहा है
खू जिसने बहाया हे वफादारे वतन का
क़ातिल हे मगर आपने सरदार कहा है
बोला ही नहीं हमने अमल करके दिखाया
दुनिया ने हमे साहिबे किरदार कहा है
देते हैं हमे भीख जो हमसे ही छिनाकर
उनको ही मेरी कौम ने ज़रदार कहा है
हसरत ही नहीं छीन के खाएं जो किसी से
ग़ुरबत ने हमें शान से खुद्दार कहा है
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ग़ज़ल
करके साज़िश मज़लूमों का खून बहाने वालों ने
मेरे वतन में हद कर दी सरकार चलाने वालों ने
असलम दशरथ जग्गू जॉनी सबकी लाशें साथ मिली
किसका मजहब पूंछा है बंदूक चलाने वालों ने
अस्मत लूटी ख़ून बहाया आग लगा दी बस्ती में
बच्चों को भी न छोड़ा कोहराम मचाने वालों नें
देरो हरम के नाम पे देखो इंसानो को बांट दिया
वोट की ख़ातिर नफ़रत का माहौल बनाने वालों ने
कुछ पैसों की ख़ातिर देखो देश को अपने बेच दिया
हम पर ही ग़द्दारी का इलज़ाम लगाने वालों ने
हसरत इस गुलशन को कितने अरमानों से सींचा था
इस मिट्टी के खातिर अपनी जान गवाने वालों ने
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ग़ज़ल
२२२२ २२२२ २२२२ २२२
ज़ुल्मो सितम से सत्ता का माहोल बनाया जाता है
साज़िश करके मजलूमों का खून बहाया जाता है
घर में घुस के हम को मारे दुश्मन की ओकात नहीं
मिल जुल कर ही सरहद पे बारूद बिछाया जाता है
अपना उसको मान रहे हैं आज भी मुस्लिम जाने क्यू
दौर ए हुकूमत में जिसके गुम्बद को गिराया जाता है
चड्डी वाले अंग्रेज़ों के पैर दबाते मिलते हैं
जंगे आज़ादी का जब इतिहास उठाया जाता है
मेरे वतन की मसनद पे जिस रोज़ से क़ातिल बैठा है
भीड़ दिखा कर कुत्तों की शेरों को डराया जाता है
सर को कटा के सजदे में शब्बीर ने ये पैग़ाम दिया
जान हथेली पे रख कर इस्लाम बचाया जाता है
जब भी दी आवाज़ वतन ने खून से अपने सींचा है
लेकिन हसरत हमको ही ग़द्दार बताया जाता है
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ग़ज़ल
221 2121 1221 122
यूँ ही नहीं मिली ये ज़िया अपने चमन को
सींचा हे अपने खू से शहीदों ने वतन को
अपनी अता को भेज दिया मुल्क़े अरब से
कितना अज़ीज़ हे ये वतन शाहे ज़मन को
उसका नसीब क्यों न बुलंदी पे रहेगा
कायम किया हे जिसने मोहब्बत के चलन को
तारिख उसकी याद दिलाती ही रहेगी
जिसने वतन के वास्ते चूमा हे रसन को
जिसको वतन से प्यार था न अहले वतन से
मरने के बाद शख्स वो तरसा हे कफन को
जिसने जहाँ को अम्न का पैग़ाम दिया हे
वो ही वतन ये आज तरसता हे अमन को
खाओ क़सम के आज से मिलजुल के रहेंगे
वो दिन नहीं हे दूर के छु लेंगे गगन को
हसरत वतन की शान बयां करते रहो तुम
इसके तुफेल शोहरतें मिलती हैं सुखन को
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ग़ज़ल
२२१ २१२१ १२२१ २१२
रहने लगा हे दिल ये मेरा किस ख़ुमार में
ख़ुद से ही बेख़बर हे सनम तेरे प्यार
खाबो ख़याल पे भी हुकूमत हे आपकी
कुछ भी नहीं हे अब तो मेरे इख़्तियार में
डरने लगा हे दिल ये मेरा इस ख्याल से
दम ही न टूट जाये तेरे इंतज़ार में
मिल जायेगा हयात में मुझको भी हमसफ़र
सारा सफ़र गया ये इसी ऐतबार में
दुनिया की महफिलों में ये लगता नहीं हे दिल
दिल को सुकून आये हे तेरे दयार में
या रब करम तू कर दे मेरे हाले ज़ार पर
तन्हाई मार दे न मुझे हिज़रे यार में
करके शुमार उसकी अता को न देख तू
रहमत ख़ुदा की आई हे किसके शुमार में
सींचा हे अपने खू से भी प्यारे वतन तुझे
हरगिज कमी न आने दी तेरे वक़ार मे
तेरा ही नाम लेके धड़कता हे ये सदा
तेरी ही आरज़ू हे दिले बेक़रार में
गुलशन की हर कलि के लबों पर सवाल ह
हसरत उदास क्यों हे तू फस्ले बहार में
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ग़ज़ल
122 122 122 122
मुखालिफ़ मेरे ये हवा चल रही है।
मगर साथ मां की दुआ चल रही है।।
ये दिल मुंतज़िर है ख़ुशी के लिए पर।
ख़ुशी मुझसे मेरी ख़फ़ा चल रही है।।
अभी तर हैं अश्क़ों से आंखें ये मेरी।
तो ग़ुरबत भी मुझ पे फ़िदा चल रही है।।
अभी इश्क़ की कुछ हरारत हुई है।
अभी मेरे दिल की दवा चल रही है ।
तुम्हारे बिना दिल का गुलशन हे सूना
गुलों से भी खुशबू जुदा चल रही है !!
मुहब्बत में दिल का ये आलम है "हसरत"।
यूं लगता है जैसे सज़ा चल रही है।।
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ग़ज़ल
किसी के इश्क में खुद को मिटा कर देख लेते हैं
ये रस्ता आखरी भी आज़मा कर देख लेते हैं
उजाले की ज़रुरत जब भी हमको पेश आती हे
तेरी यादों की शम्मा को जला कर देख लेते हैं
तरसती हैं निगाहें जब तेरा दीदार करने को
तसव्वुर में तेरी सूरत को ला कर देख लेते हैं
हक़ीक़त में तुझे छूना मेरी हस्ती से बाहर है
तेरी तस्वीर से ज़ुल्फ़ें हटा कर देख लेते हैं
जिसे हमने सुनाया हे कहा उसने हमें पागल
तुम्हें भी हाल ए दिल अपना सुना कर देख लेते हैं
सुना हे तीरगी का खात्मा हो जायेगा इस से
चराग़ो में लहू अपना जला कर देख लेते हैं
थे जितने दोस्त सबको आज़मा कर थक चुके हसरत
अदू को भी गले अपने लगा कर देख लेते हैं
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ग़ज़ल
रफ़्ता रफ़्ता तमाम कर देंगे
ज़िन्दगी तेरे नाम कर देंगे
तुम भुला ही न पाओगे हमको
एक दिन ऐसा काम कर देंगे
नाम तेरे पड़ी ज़रुरत तो
अपने हिस्से का जाम कर देंगे
नफरतों का ही आसरा लेकर
तेरे दिल में क़याम कर देंगे
एक "हसरत" जो बर नहीं आयी
हसरतों को हराम कर देंगे
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ग़ज़ल
निगाहें नाज़ से पहले लबो रुखसार से पहले
हसीं थी सारी दुनिया ये जमाले यार से पहले
सितारों के नजारों को हसीं समझा किये बरसों
हक़ीक़त से ही ग़ाफिल थे तेरे दीदार से पहले
मुहब्बत आशना इसको मुहब्बत ही बताते हैं
सनम नाराज़ होते हैं वफ़ा ओ प्यार से पहले
ख़ुदा मालूम मरता या के कुछ दिन और जी लेता
मसीहा बनके मिलते तो सही बीमार से पहले
कहा उसने न छूना तुम मेरे नजदीक मत आना
कभी इनकार से पहले कभी इक़रार से पहले
तुझे देखा तो रुखसत हो गए होशो ख़िरद मेरे
सुकूने क़ल्ब हासिल था तेरे दीदार से पहले
बिठाकर सामने उनको करी हे गुफ्तगू हसरत
बहुत बातें करीं मैंने दरो दीवार से पहले
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ग़ज़ल
दिल से कोई दुआ नहीं देता
दर्दे दिल की दवा नहीं देता
कितना संगदिल हे वो सनम मेरा
कुछ भी ग़म के सिवा नहीं देता
मेरी क़िस्मत का डूबता सूरज
रौशनी का पता नहीं देता
लोग कहते हैं तू मसीहा है
मुझको क्यों कर शिफ़ा नहीं देता
सबकी उम्मीद बर नहीं आती
सबको सब कुछ ख़ुदा नहीं देता
एक ख़ूबी हे उसमे ए हसरत
वो किसी को दग़ा नहीं देता
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ग़ज़ल
तुझसे उल्फत सनम बेपनाह हो गयी
तेरे बिन ज़िन्दगी अब गुनाह हो गयी
तूने मुड़ के जो देखा मुझे इक नज़र
नींद रातों की मेरी तबाह हो गयी
धड़कनें रुक गयीं वक़्त थम सा गया
मेरी जानिब जब उनकी निगाह हो गयी
तुम मेरे हो गए मैं तुम्हारा हुआ
आँखों आँखों में यकदम सलाह हो गयी
नाम तेरा लिया हिचकियाँ रुक गयीं
याद करते हो हिचकी गवाह हो गयी
तेरे हसरत को बस चैन आ जायेगा
तेरी आगोश में गर पनाह हो गयी
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ग़ज़ल
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
हमारा दिल धड़कता है तुम्हारा नाम ले लेकर
कोई अरमां मचलता है तुम्हारा नाम ले लेकर
तुम्हारे ही तख़य्युल में गुज़र जाती है शब् सारी
हमारा दिन निकलता है तुम्हारा नाम ले लेकर
दिल ए बेकल को समझाना बहुत मुश्किल हुआ अब तो
कलेजे से निकलता है तुम्हारा नाम ले लेकर
ये आशिक़ है इसे ज़ुल्फों के साये में छिपा लीजे
दीवाना है संभालता है तुम्हारा नाम ले लेकर
मुक़द्दर की बुलंदी ने बनाया ........ तुमको
हमारा काम चलता है तुम्हारा नाम ले लेकर
तुम्हें अपना बनाने की क़सम खाई है हसरत ने
दुआ में हाथ मलता है तुम्हारा नाम ले लेकर
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ग़ज़ल
212 212 212 212
फाइलुन फाइलुन फाइलुन फाइलुन
(बह्र: मुतदारिक मुसम्मन सालिम )
दिल में तेरे सिवा दूसरा कौन है
तुझको मेरी तरह चाहता कौन है
साथ मेरे अगर तुझको रहना नहीं
जा चला जा तुझे रोकता कौन है
खून किसका बहा किसका घर जल गया
अब वतन में मेरे सोचता कौन हैं
अच्छे दिन आयेंगे काला धन आएगा
इस क़दर दोस्तों फेंकता कौन है
दिल के आँगन में ये दर्द की शाख़ पर
फूल सा मुस्कुराता हुआ कौन है
अब न हसरत कोई मेरी तेरे सिवा
रब से हर दम तुझे मांगता कौन है
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ग़ज़ल
212 212 1222
ज़ुल्म जब जब जहाँ से उठता है
ज़लज़ला फिर वहां से उठता है
रिज्क इतना ही था यहाँ अपना
काफ़ला अब यहाँ से उठता है
फिर किसी का जला है घर शायद
ये धुआं सा कहाँ से उठता है
वो कहीं भी सुकूं नहीं पाता
जो तेरे आस्तां से उठता है
कौन करता है अब वफ़ादारी
अब भरोसा जहाँ से उठता है
अब्र तो दूर तक नहीं हसरत
शोर क्यों आसमां से उठता है
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ग़ज़ल
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
रसूले पाक का हमसे यही फ़रमान कहता है
वतन पे जान दे देना यही ईमान कहता है
जो मारे बेगुनाहों को मुसलमां हो नहीं सकता
ज़रा तुम खोल कर देखो यही क़ुरआन कहता है
झुके हैं ना झुकेंगे हम सितमगर सामने तेरे
हुई थी जंगे करबल जिस पे वो मैदान कहता है
मेरे असलाफ़ ने सींचा वतन को खून से अपने
उठाकर देख लो तारीख़ हिन्दुस्तान कहता है
मोहब्बत से बड़ी कोई इबादत हो नहीं सकती
मेरा दिल हर घडी मुझसे ये मेरी जान कहता है
हसी मेरी उड़ाता है या मुझसे प्यार करता है
मेरा साथी कभी दानिश कभी नादान कहता है
वतन पे हक़ बराबर है हमारा भी तुम्हारा भी
यही इन्साफ है हसरत यही मीज़ान कहता है
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ग़ज़ल
2211 2211 2211 22
नादान भला तू ही बता कैसे मिलेगी
आंधी से चराग़ों को वफ़ा कैसे मिलेगी
मुंसिफ़ भी उसी का है उसी की है अदालत
क़ातिल को गुनाहों की सज़ा कैसे मिलेगी
हर गुल को सिखा देते हो नफ़रत का सलीक़ा
गुलशन से तुम्हें बू ए वफ़ा कैसे मिलेगी
तडपेगा बहुत रोयेगा दुनिया में सितमगर
जल्लाद को आसान क़ज़ा कैसे मिलेगी
ये सोच के कल रात को रोया हूँ बहुत मैं
दिल तोड़ने वाले को दुआ कैसे मिलेगी
हसरत तू बता मैं तो बहुत ढूंढ चूका हूँ
माँ जैसी ज़माने में वफ़ा कैसे मिलेगी
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ग़ज़ल
कराके मुल्क में दंगे हुकूमत कौन करता है
पता सबको है नफरत की सियासत कौन करता है
इधर नफरत के सौदागर उधर सरहद के रखवाले
वतन तू ही बता तेरी हिफाज़त कौन करता है
पुराने हो गए किस्से सभी फ़रहाद शीरीं के
फ़कत जिस्मों की चाहत है मोहब्बत कौन करता है
यही हालात कहते हैं यही मंज़र बताते हैं
ग़रीबों की ज़माने में हिमायत कौन करता है
अदा हमने किये हैं साया ए तलवार में सजदे
ख़ुदा की इस तरह जग में इबादत कौन करता है
सभी मशरूफ़ हैं मक्कारियों की चालसाज़ी में
कहाँ अखलाक़ वाले हैं मुरव्वत कौन करता है
सभी अहले वतन खुश हों रहे अमनो अमां कायम
तमान्ना किसकी ऐसी है ये हसरत कौन करता है
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ग़ज़ल
इश्क़ करता है कोन दुनिया में
दिल से मरता है कोन दुनिया में
मुफ़्त शेखी बगारने वाले
तुझसे डरता है कोन दुनिया में
महवे हैरत है आसमां मुझ पर
आहें भरता है कोन दुनिया में
आईना बन गए हैं हम लेकिन
अब संवरता है कौन दुनिया में
सबको करना है कूच दुनिया से
कब ठहरता है कौन दुनिया में
अब न मुंसिफ़ कोई उमर जैसा
अद्ल करता है कौन दुनिया में
दिल की गहराई से तुझे हसरत
याद करता है कौन दुनिया में
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ग़ज़ल
पिला दे ज़हर भी तू तो मुझे दवा ही लगे
तेरा कसूर भी मुझको तेरी अदा ही लगे
हबीब बनता हे रखता हे बुग्ज़ दिल में मगर
हर एक उसकी दुआ मुझको बद्दुआ ही लगे
मिला हे हंस के वो मुझसे मेरे गले भी लगा
मगर मुझे तो वो अब भी खफा खफा ही लगे
गुज़र गया हे ज़माना बहार देखे हुए
ये खिड़की खोलो ज़रा सुबह की हवा ही लगे
अजीब हाल हे दिल का न पूँछ मेरे सनम
मेरे करीब हे लेकिन जुदा जुदा ही लगे
यही दुआ हे ये हसरत हे आरज़ू हे मेरी
गुलाब जैसा ये चेहरा खिला खिला ही लगे
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ग़ज़ल
जाने क्या सोच के उसने ये हिमाक़त की है
हो के दरिया जो समंदर से अदावत की है
खींच लायी हे तेरे दर पे ज़रुरत मुझको
हो के मजबूर उसूलों से बग़ावत की है
हमने ख़ारों पे बिछाया हे बिछोना अपना
हमने तलवारों के साये में इबादद की है
अच्छे हमसाये की तालीम मिली हे हमको
हमने जाँ दे के पडोसी की हिफाज़त की है
आज आमाल ही पस्ती का सबब हैं वरना
हमने हर दौर में दुनिया पे हुकूमत की है
दम मेरा कूच -ए -सरकार जाकर निकले
इस तमन्ना के सिवा कुछ भी न हसरत की है
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ग़ज़ल
सोचा था हमने फूल खिलेंगे बहार में
सींचा चमन लहू से इसी ऐतबार में
दिल भी नज़र भी ख़्वाब भी सब आपके हुए
कुछ भी नहीं हे अब तो मेरे इख्तियार में
ए सग तेरे नसीब का क्या तज्क़रा करूं
तू आये जाए रोज़ सनम के दयार में
होशो हवास अक्लो खिरद हसरतें तमाम
सब कुछ लुटा दिया हे तेरे इंतज़ार में
कोशिश अदू की नीचा दिखाने की हे मगर
हरगिज़ कमी न आएगी मेरे वक़ार में
आया वफ़ा की राह में कैसा मकाम ये
अब ज़िन्दगी खड़ी हे ग़मों की क़तार में
कोशिश के बावजूद भी कटती नहीं हे शब
उठ उठ के बेठता हूँ तेरे इंतज़ार में
हसरत वफ़ा की राह में सब कुछ लुटा दिया
सपने तमाम बह गए अश्क़ों की धार में
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ग़ज़ल
लहू से जिसको के सींचा था बागबां की तरह
वही चमन नज़र आता हे अब खिज़ां की तरह
हवा का झोंका भी आया तो रोक लूँगा उसे
खड़ा हूँ तेरी हिफाज़त में पासबां की तरह
कभी हयात में हमको सुकूं मिला ही नहीं
के रोज़ो शब् नज़र आते हैं कारवां की तरह
खुदा की याद में खुद को मिटा लिया जबसे
मेरा वजूद ज़मीन पर हे आसमां की तरह
ये तज़र्बे बड़ी मुश्किल से पाये हैं हमने
हयात हमने गुज़ारी हे इन्तेहाँ की तरह
वो जिसको लोग बुरा आदमी बताते थे
सुलूक़ मुझसे किया उसने मेहरबां की तरह
तमाम उम्र गुज़ारी हे मैंने ख़्वाबों में
मुझे लगे हे हकीकत भी अब गुमां की तरह
ज़ुबान खोल दी मैंने तो तेरी खैर नहीं
इसी सबब से खड़ा हूँ मैं बेज़ुबां की तरह
वो जिसके वास्ते खुद को मिटा दिया हमने
भुला दिया हे हमें उसने दास्ताँ की तरह
अजीब हाल हे हसरत जहाँ के लोगों का
यहाँ यहाँ की तरह हैं वहां वहां की तरह
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ग़ज़ल
कौम पे मेरी मेरे मौला कैसी मुश्किल आई है
ग़ैरत का एहसास नहीं हे भाई का दुश्मन भाई है
करबल की तारिख में हमने इस मंज़र को देखा हे
जितने सच्चे लोग हैं उनके हिस्से में तन्हाई है
जिस गुलशन का पत्ता पत्ता प्यार की बातें करता था
अम्न के उस गुलशन में आखिर किसने आग लगायी है
कल मुन्शिफ के सामने ये सच्चाई जाने वाली थी
जिसकी तुमने चोराहे पर जिंदा लाश जलाई है
जब भी कोई बम फटता हे नाम हमारा आता है
"हसरत" ये इलज़ाम नहीं हे बलके इक सच्चाई है
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ग़ज़ल
जब मेरी जीस्त में उनका आना हुआ
वादिये दिल का मौसम सुहाना हुआ
जब से वो बस गए आके दिल में मेरे
दिल मेरा इक हसीं आशियाना हुआ
कब से दिल को बचाकर रखा था मगर
उनकी नज़रों का पल में निशाना हुआ
बदले बदले से वो मुझको आये नज
जब से ग़ैरों के घर आना जाना हुआ
इस क़दर गिर गया वो नज़र से मेरी
अब तो मुश्किल ये रिश्ता निभाना हुआ
वो भी क्या दिन थे जब साथ थे वो मेरे
अब तो हसरत ये किस्सा पुराना हुआ
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ग़ज़ल
इन आँखों से आंसू निकलते निकलते
कटी रात करवट बदलते बदलते
मोहब्बत हे मुझसे तो कह दो किसी दिन
इशारे से छत पर टहलते टहलते
मोहब्बत की राहों में कांटे मिलेंगे
उठाना क़दम तुम संभलते संभलते
यकीं हे मुझको के इक रोज़ खुद ही
बहल जायेगा दिल बहलते बहलते
मेरी याद जब जब सताएगी हसरत
वो रोयेंगे आँखें मसलते मसलते
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ग़ज़ल
अब तो पूरी ये आरजू कर दे
मैँरे दामन मे तू खुशी भर दे
दर्द देकर तू अपनी चाहत का
मुझको उल्फत से आशना कर दे
कब से हैं मुंतज़िर मेरी आखें
इन चिरागोँ मेँ रोशनी भर दे
चँद कतरोँ से अब मैँरी हरगिज
प्यास बुझती नहीँ समँदर दे
या खुदा अब तो उनके कूचे मेँ
खत्म हसरत की जिन्दगी कर दे
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ग़ज़ल
हर दिल में मुहब्बत की अब शमअ जलानी हे
अब हमको तअस्सुब की ये आग बुझानी हे
नफरत से न तुम देखो हमको ऐ जहाँ वालों
हमसे ही तो उल्फत के दरिया में रवानी हे
हे उसके ही हाथों में इज्ज़त भी ओ ज़िल्लत भी
ये कौल नहीं मेरा आयाते कुरानी हे
क्या खूब अजूबा हे देखो तो जहाँ वालों
पत्थर की ईमारत भी उल्फत की निशानी हे
अश्कों के तलातुम को रोकोगे भला केसे
खुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी हे
इस ग़म का सबब क्या हे लो तुम को बताता हूँ
हसरत के भी सीने में इक याद पुरानी हे
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ग़ज़ल
तुम मिले तो मुझे हर ख़ुशी मिल गयी
यूँ लगा के मुझे जिंदगी मिल गयी
कांच सा टूटकर दिल बिखर जायेगा
अब इसे गर तेरी बेरुखी मिल गयी
तेरी चाहत ने दिल को बनाया हे दिल
क्या हुआ गर मुझे बेकली मिल गयी
इस तरह दिल को रोशन किया आपने
यूँ लगा रात को चांदनी मिल गयी
सुन के आवाज़ तेरी मुझे यूँ लगा
मेरे नगमो को अब रागनी मिल गयी
तुझको देख तो दिल से ये आई सदा
मुझको हसरत मेरी शायरी मिल गयी
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ग़ज़ल
हक की खातिर लड़ते जाना बस तेरी पहचान है
सामने हर वक़्त तेरे जंग का मैदान है
ऐ वतन तेरे लिए तो हे मेरा सब कुछ फ़िदा
दिल फ़िदा हे तन फ़िदा हे उर फ़िदा ये जान है
जिस तरफ देखो वहीँ पे जल रही हैं बस्तियां
ये हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है
इस मुसीबत में खुदाया तू मेरी इमदाद कर
बीच सागर में हे कस्ती सामने तूफ़ान है
हाँ खुदा मिल जायेगा "हसरत" मिटा दूं गर खुदी
नफ्स से लड़ना मगर किसने कहा आसान है
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ग़ज़ल
दिल में तेरी याद बसी हे डसती ये तन्हाई है
फीकी फीकी लगती मुझको अब तो हर रानाई है
फिर से दिल में दर्द उठा हे आँख मेरी भर आई है
बेठे बेठे आज यकायक याद किसी की आई है
उसको भी ना चैन मिलेगा वो भी यूँ ही तड़पेगा
मेरे दिल के इस गुलशन में जिसने आग लगाई है
अब तो आजा देर ना कर तू पूछ रहे हैं सब मुझसे
किसकी ख़ातिर तुमने आख़िर महफ़िल आज सजाई है
पार उतरने की ही ख़ाहिश सबके दिल में हे भाई
पूंछे कोन समंदर से तुझमे कितनी गहराई है
रुसवा करके मुझको आख़िर तू कैसे बच पायेगा
हसरत गर बदनाम हुआ तो तेरी भी रुसवाई है
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ग़ज़ल
सदा आती है ये अक्सर तड़प के मेरे सीने से
तेरे क़दमों में दे दूं जां जुदा रहकर के जीने से
मोहब्बत के मुसाफिर को कभी मंजिल नहीं मिलती
जिसे साहिल की हसरत है उतर जाए सफीने से
मोहब्बत जो भी करते हैं बड़ी तकदीर वाले हैं
चमक जाती हैं तकदीरें मोहब्बत के नगीने से
तेरी यादों के जुगनू हैं तेरी खुशबू हे साँसों में
यही मोती मिले मुझको मोहब्बत के खजीने से
किसी आशिक की तुर्बत पे ग़ज़ल मैंने पढी हसरत
मुक़र्रर की सदा आई अचानक उस दफीने से
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ग़ज़ल
अब तो तुम्हारे इश्क में बीमार हम नहीं
उल्फ़त में अब तुम्हारी गिरफ्तार हम नहीं
उनकी ख़ुशी की चाह में हमने भी कह दिया
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं
दो पल जो मेरे साथ न ग़र्दिश में रह सके
उनसे तो अब वफ़ा के तलबगार हम नहीं
हालात कह रहे हें क़यामत करीब हे
ग़फलत की फिर भी नींद से बेदार हम नहीं
हमने भी अपने खून से सींचा हे ये चमन
ये किसने कह दिया के वफ़ादार हम नहीं
ज़ुल्मो सितम करे है जो मजहब की आड़ में
ऐसे गिरोह के तो मददगार हम नहीं
‘हसरत’ हमें तो प्यार ही आता हें बांटना
ज़ोरो जफा सितम के तरफदार हम नहीं
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ग़ज़ल
ग़म की भवर से मेरा सफीना उभर गया
उनसे मिली नज़र तो मुक़द्दर संवर गया
तेरी ही आरज़ू में ये गुजरी हे ज़िन्दगी
तेरी ही जुस्तजू में ये सारा सफ़र गया
दोलत गयी न साथ न रिश्ता गया कोई
सब कुछ यहीं पे छोड़ के हर इक बशर गया
माना के मुझको जीस्त में ग़म ही मिले मगर
तपकर दुखों की आंच में कुछ तो निखर गया
कहती थी दुनिया सोने की चिड़िया इसे कभी
हसरत वो मेरे मुल्क का रुतबा किधर गया
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ग़ज़ल
चाहा था दिल ने जिसको वो दिलदार कब मिला
सब कुछ मिला जहाँ में मगर प्यार कब मिला
तनहा ही ते किये हैं ये पुरखार रास्ते
इस जीस्त के सफ़र में कोई यार कब मिला
बाज़ार से भी गुज़रे हैं हाथों में दिल लिए
लेकिन हमारे दिल को खरीदार कब मिला
उल्फत में जां भी हंस के लुटा देते हम मगर
हम को वफ़ा का कोई तलबगार कब मिला
तनहा ही लड़ रहा हूँ हालाते जीस्त से
हसरत को जिंदगी में मददगार कब मिला
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ग़ज़ल
यूँ न मुझको सनम तुम सताया करो
मुझसे वादा करो तो निभाया करो
दर्द दिल में छुपाने से क्या फाएदा
हे अगर इश्क तो फिर जताया करो
क्या तुम्हारे हे दिल में मुझे हे पता
यूँ न मुझसे बहाने बनाया करो
चाहते हो अगर छोड़ दूं मैक़शी
आप अपनी नज़र से पिलाया करो
इस तरह मिलने में कुछ खसारा नहीं
तुम मेरे ख़ाब में रोज़ आया करो
तुमको रोते हुए देख सकता नहीं
यूँ न आंसू सनम तुम बहाया करो
ज़िन्दगी का सनम कुछ भरोसा नहीं
जब मिलो प्यार से पेश आया करो
हम मिलेंगे खुदा पे भरोसा रखो
हाथ अपने दुआ में उठाया करो
मेरी उल्फत पे तुमको यकीं आएगा
अपने हसरत को तुम आजमाया करो
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ग़ज़ल
फिर से गुजरे वो पल याद आने लगे
भूल जाने में जिनको ज़माने लगे
हैं वही शोखियाँ है वही बांकपन
जितने मंज़र हैं सारे पुराने लगे
कोनसी शै हे जिसपर भरोसा करें
अब तो साए भी अपने डराने लगे
उनको खुशियाँ मिलीं हे ख़ुदा का करम
हाथ अपने ग़मों के खजाने लगे
अपनी हसरत बताने जिन्हें आये थे
वो तो अपना ही मुज़्दा सुनाने लगे
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ग़ज़ल
उसकी पहली नज़र ही असर कर गयी
एक पल में ही दिल में वो घर कर गयी
हर गली कर गयी हर डगर कर गयी
मुझको रुसवा तेरी इक नज़र कर गयी
मैंने देखा उसे देखता रह गया
मुझको खुद से ही वो बेखबर कर गयी
साथ चलने का तो मुझसे वादा किया
वो तो तन्हा ही लेकिन सफ़र कर गयी
जिस घडी पड़ गयी इक नज़र यार की
एक ज़र्रे को शम्सो कमर कर गयी
हमने मांगी थी 'हसरत' जो रब से दुआ
वो दुआ अब यक़ीनन असर कर गयी
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ग़ज़ल
ये सज़ा मिली मुझको तुमसे दिल लगाने की
ये सज़ा मिली मुझको तुमसे दिल लगाने की
मिल रही हें बस मुझको ठोकरें ज़माने की
फैसला हे ये मेरा मैं तुम्हें भुला दूंगा
तुमको भी इजाज़त हे मुझको भूल जाने की
ख़ाब अब मुहब्बत के मैं कभी न देखूँगा
ताब ही नहीं मुझमे फिर से ज़ख्म खाने की
रह गयी उदासी हीअब तो मेरे हिस्से में
अब वजह नहीं कोई मेरे मुस्कुराने की
वो चले गए लेकिन हम न कुछ भी कह पाए
दिल में रह गयी हसरत हाले दिल बताने की
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ग़ज़ल
आँखों में भरे खूँ लिए तलवार खड़ा है
करने को मुझे कत्ल मेरा यार खडा है .
आ जाये सुकूँ दिल को तू कुछ ऐसी दुआ दे
चोखट पे तेरी आज ये बीमार खडा है
.
जाने दे मुझे मौत की आगोश मे हमदम
क्योँ बनके मेरी राह मे दीवार खडा है
.
मरकर ही सही आज ये एजाज मिला तो
करने को मेरा आज वो दीदार खडा है
.
गर मुझको मिटाने का वो रखते हें इरादा
हसरत भी फना होने को तय्यार खडा है.
















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